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Saturday 10 April 2021
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मतदाताओं की अपेक्षा पर खरी उतरी है भाजपा

मतदाताओं की अपेक्षा पर खरी उतरी है भाजपा

रुपाणी के सुदृढ नेतृत्व व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सी.आर.पाटिल की प्रभावी रणनीति का करिश्मा

गणपत भंसाली

गुजरात के अहमदाबाद बरोड़ा, भावनगर, जामनगर, राजकोट व सूरत महानगर पालिकाओं के सम्पन्न हुए चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने तकरीबन 85 प्रतिशत सीटों पर विजय श्री हासिल कर ये साबित कर दिया कि गुजरात अभी भी भाजपा का अभेद्य गढ़ है तथा पार्टी की नीतियों को मतदाता पसन्द कर रहे हैं।यही वजह है कि राज्य की छह में से छह महानगर पालिकाओं पर कब्जा बनाए रखा हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी,गृहमंत्री अमित शाह,भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी नड्डा ने इस जीत पर ट्वीट कर खुशी का इजहार किया है। प्रश्न उठता है कि विश्व व्यापी कोरोना काल में आर्थिक विकास की गति मंद हो जाना,रोजगार के अवसर सीमित हो जाना, 90 दिनों से अनवरत चल रहा किसान आंदोलन,कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियों द्वारा निरंतर सत्तारूढ़ पार्टी पर शाब्दिक हमले करना,चीन के मुद्दे पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा भाजपा सरकार को घेरे में लेनाआदि अनेक मुद्दे है जो मतदाताओं को विचलित करने हेतु काफी है,लेकिन ये तमाम आरोप, तथा विभिन्न दिक्कतें विकास कार्यों के आगे बौने साबित हुए।सूरत महानगरपालिका द्वारा कराए गए विकास कार्यों का आकलन करें तो अमूमन शहर वासी सन्तुष्ट है।गौरतलब है कि अपनी आजीविका के लिए लाखों लोगों ने इस शहर को अपनी कर्म स्थली के रूप में चुना हैं।

राजस्थान,हरियाणा,पंजाब, झारखंड,उड़ीसा,बंगाल,आंध्रप्रदेश, उत्तरप्रदेश,बिहार,उत्तराखंड, मध्यप्रदेश,छतीसगढ़,महाराष्ट्र आदि जिन राज्यों से भी नागरिक आकर सूरत में निवास कर रहे हैं।कहीं न कहीं उन्हें सूरत का प्रशासन अपने गृह नगरों की तुलना में बेहतर महसूस हो रहा है।यहां की सुविधाएं उन्हें भा रही है। ये सत्य भी है,बिजली, पानी व गैस की नियमित आपूर्ति, साफ-सुथरी व चौड़ी सड़कें,हरे-भरे सैकड़ों बाग-बगीचे, पग-पग पर फ्लाय ओवर, लोकल परिवहन सेवा के रूप में बी.आर.टी.एस की बेहतरीन व्यवस्था, माकूल कानून व्यवस्था तथा स्वच्छता में सम्पूर्ण भारत में द्वितीय स्थान प्राप्त कर देना आदि अनेक सुविधाएं व आकर्षण है जिसका आकलन कर मतदाता ने अपना समर्थन मतदान के समय प्रकट किया है।अगर मतदाता असंतुष्ट होता तो ई.वी.एम नतीजे विपरीत देती। परम्परागत वोटर तक भी ये गुणदोष अवश्य देखता है। अगर हम वर्ष 2015 में हुए सूरत महानगर पालिका के चुनावों में भाजपा व कांग्रेस पार्टी को मिली सीटों पर विजय का लेखा जोखा करें तो वर्ष के चुनावों में 2015 में 116 सीटों में से 80 सीटों पर भाजपा व 36 सीटों पर कांग्रेस ने विजय श्री हासिल की थी, कांग्रेस को मिली 36 सीटों में से अधिकांश सीटें पाटीदार आरक्षण सिमिति (पास) से जुड़े वोटरों के सहारे मिली थी। इस बार ‘पास’ नेताओं ने कांग्रेस से नाता तौड़ कर आम आदमी पार्टी का दामन थाम दिया था।27 सीटें ‘आप’ को गई है वे कांग्रेस का सुफड़ा साफ होने के कारण ही मिल पाई है।अगर आप को जन समर्थन मिलता तो पाटीदार विहीन वार्डों से भी हासिल होती।

व बरोड़ा,अहमदाबाद,राजकोट,भावनगर,जामनगर की महानगरपालिकाओं में भी ये पार्टी अपना खाता खोलती। प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि सूरत पाटीदार आरक्षण सिमिति ‘पास’ का गढ़ है और हार्दिक पटेल की वजह से गत वर्ष पास का समर्थन कांग्रेस को था,लेकिन ये तो आश्चर्य का विषय है कि अब जबकि पाटीदार आंदोलन के जनक हार्दिक पटेल स्वंय कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में पद सम्भाले हुए है फिर भी पास नेता कांग्रेस से दूरी बना बैठे और इसका फायदा आप नेताओं ने उठा दिया,ये उल्लेखनीय है कि आप नेताओं ने पास कार्यकर्ताओं व नेताओं पर डोरे डालने कभी से शुरू कर दिए थे और वे लगातार इनके सम्पर्क में थे तथा चुनावों के दौरान आप नेता संजय सिंह,मनीष सिसोदिया तथा दिल्ली के और नेता सूरत का दौरा कर चुके हैं,बड़ी रैली आयोजित कर चुके हैं, गरबा कार्यक्रम का आयोजन कर पास नेताओं को अपने खेमे में लाने का हर सम्भव प्रयत्न कर चुके हैं, बताया जाता हैं कि सूरत मनपा चुनावों के दौरान कार्यकर्ताओं की बहुत बड़ी सभा तक आयोजित कर चुके हैं, यहां तक सूरत की आम आदमी पार्टी की कार्यकारिणी में अधिकांश पास नेता ही पदों पर आसीन हैं।इन चुनाव परिणामो को देख अब ‘आप’ सुप्रीमों तथा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल आगामी 26 फरवरी को सूरत पहुंच कर बहुत बड़ी रैली में भाग लेने वाले हैं।कुल मिला कर आम आदमी पार्टी के नेताओं की सूरत के पाटीदार नेताओं के अलावा मुस्लिम वोटरों पर भी पूरी नजर रहेगी, आप नेताओं को ये भली भांति विदित है कि उनके खेमें में या तो कांग्रेस या फिर भाजपा से असंतुष्ट नेता ही आ पाएंगे क्योंकि आप का कोई परम्परागत वोटर तो है नही, ये बात भी सपष्ट है कि गुजरात भाजपा का पुराना गढ़ है और मुफ्त का प्रलोभन यहां विशेष असर नही कर पायेगा,अगर असर करता तो तमाम शहरो व सूरत के सभी वार्डो में ‘आप’ का खाता खुलता।पास नेताओं की आप से जुड़ने की मुख्य वजह पाटीदार आंदोलन की वजह से भाजपा से बनी दूरियां है और उन दूरियों की वजह पाटीदार नेता हार्दिक पटेल का सदैव भाजपा के विपरीत चलना रहा हैं।

अगर हम विश्लेषण करें तो भाजपा को तो वर्ष 2015 के मुकाबले वर्ष 2021 के चुनावों में 17 सीटों का फायदा ही हुआ हैं, 13 सीटें तो आंकड़ो के हिसाब से व 4 सीटें परिसीमन के बाद बढ़ने से। कांग्रेस की ऐसी ही फजीती वर्ष 1995 में भी हो चुकी है जब कुल 99 सीटों में से 98 सीटो पर भाजपा विजयी हुई थी व 1 अन्य को मिली थी जबकि कांग्रेस खाता तक नही खोल पाई थी। बहरहाल गुजरात के इन 6 महानगरों की पालिकाओं में भाजपा इतने लंबे समय से सता पर काबिज है तो कहीं न कहीं वोटर इस पार्टी की नीतियों को पसंद कर रहा हैं वरना सूरत के मतदाता 1990 से,भावनगर व जाम नगर 1995 से बरोड़ा व राजकोट 2005 से तथा अहमदाबाद के मतदाता 2008 से सत्ता नही सौंपते। वर्ष 2021 के महानगर पालिकाओं चुनावों में जहां गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी का प्रभावी नेतृत्व व गुजरात भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष सी.आर.पाटील के दूरदर्शिता भरे निर्णय निमित बना है।

जब से पाटील ने गुजरात भाजपा का अध्यक्ष पद संभाला है तब से वे पूर्ण समर्पण भाव से व अनंत ऊर्जा के साथ शहर-शहर व नगर-नगर की परिक्रमा कर पार्टी कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों, मतदाताओं आदि से सम्पर्क साध रहे है हर एक व्यक्ति से संवाद साध रहे हैं। यही नही प्रत्याशियों की उम्मीदवारी सम्बन्धी जो नियम लिए गए वो साहस भरे थे,ऐसी जोखिम लेने की साधारणतया हिम्मत करने से नेतागण कतराते है लेकिन ये बदलाव पार्टी के लिए संजीवनी बूटी साबित हुए,जैसे तीन बार चुनाव लड़ चुके नेताओं को तथा 60 वर्ष से ज्यादा उम्र के व्यक्ति को तथा नेताओं के रिश्तेदारों को टिकिट नही देने जैसा निर्णय वाकई प्रशंसनीय था।

इससे उम्मीदवारों के रूप में नए चेहरे सामने आए। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सी.आर पाटील सही मायनों में प्रभावी नेता साबित हुए और इनके सुदृढ नेतृत्व का फायदा भाजपा को आगामी विधानसभा चुनावों में भी मिल सकता हैं। पाटील के समक्ष अब आम आदमी पार्टी का उभरना भी एक चुनौती है उन्हें पाटीदार नेताओं को पुनःअपने खेमे में लाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी क्योंकि कांग्रेस के लिए तो ये अवसर हाथ से जा चुका है बताया जाता हैं कि इस बार कांग्रेस की 2 सीटें पास को देने सम्बन्धी जिद्द ले डूबी, अगर धर्मेश मालविया व दूसरी एडवोकेट संजय धोराजिया की धर्मपत्नी विलास धोराजिया के लिए मांगी गई टिकट दे दी जाती तो सम्भवत कांग्रेस इस दुर्दशा से बच सकती थी और आप इस विशाल आकार में नही पनप पाती।

इस बार ओवैसी की पार्टी के 7 उम्मीदवारों का जीत जाना भी चोंकाने वाला है और यह विजय भी कांग्रेस के परंपरागत वोटों में सेंध लगने से ही हो पाई है। इस बार तमाम नगरपालिकाओं में निर्दलीयों की तकदीर नही चमक पाई, बताया जाता है कि गुजरात की 6 महानगरपालिकाओं में कुल 576 सीटों पर 2276 उम्मीदवारों में सबसे ज्यादा भाजपा के 567 प्रत्यासी थे जबकि कांग्रेस के 566, आप 470, राष्ट्रवादी कांग्रेस 91, अन्य पार्टियां 353 तथा निर्दलीय 228 उम्मीदवार मैदान में थे, जबकि भाजपा को 483, कांग्रेस को 55, आप को 27, ओवैसी की पार्टी को 7 व निर्दलीयों को महज 4 सीटों पर सफलता मिली।




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