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Tuesday 26 September 2017
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70 साल पहले भारत में ऐसे शामिल हुआ कश्मीर …..

70 साल पहले भारत में ऐसे शामिल हुआ कश्मीर …..

kashmirकरीब 700 साल पहले जिस गुलिस्तां को शम्सुद्दीन शाह मीर ने सींचा था. उनके बाद तमाम नवाबों और राजाओं ने जिसको सजाया-संवारा. जिसकी आस्तानों और फिजाओं में चिनार और गुलदार की खुशबू तैरती थी. जिसे आगे चलकर जमीन की जन्नत का खिताब मिला. उसी कश्मीर में आज से ठीक सत्तर साल पहले एक राजा की नादानी और एक हुकमरान की मनमानी ने फिजाओं में बारूद का ऐसा जहर घोला जिसका गंध आज भी कश्मीर में महसूस किया जा सकता है !

मेरा मुल्क.. तेरा मुल्क.., मेरी जमीन.. तेरी जमीन, मेरे लोग.. तेरे लोग. इस गैर इंसानी जिद ने पहले तो एक हंसते खिलखिलाते मुल्क के दो टुकड़े कर दिए. लाखों लोगों को मजहब के नाम पर मार डाला गया और फिर उस जन्नत को भी जहन्नुम बना दिया गया. जिसके राजा ने बड़ी उम्मीदों के साथ अंग्रेजों से अपनी रियासत को हिंदू-मुस्लिम की सियासत से दूर रखने की गुजारिश की थी. मगर उनकी रियासत की सरहदों के नजदीक बैठे मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बनाने वाले कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्नाह कश्मीर की इस आजादी के लिए तैयार नहीं थे. उनकी दलील थी कि जिस तरह गुजरात के जूनागढ़ में हिंदू अवाम की तादाद को देखते हुए उसेहिंदुस्तान में मिलाया गया उसी तरह कश्मीर में मुसलमानों की आबादी के हिसाब से उसपर सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान का हक है.

अपनी इसी जिद को मनवाने के लिए जिन्नाह ने कश्मीर के महाराजा हरि सिंह पर दबाव बनाना शुरू कर दिया और कश्मीर को जाने वाली तमाम जरूरी चीजों की सप्लाई बंद कर दी. पाकिस्तान कश्मीर को अपने साथ मिलने के लिए अब ताकत का इस्तेमाल करने लगा. महाराज हरि सिंह अकेले उनका मुकाबला नहीं कर पा रहे थे. अब साफ लगने लगा था कि उनके हाथ से कश्मीर तो जाएगा, साथ ही डोगरा रियासत की आन-बान भी खत्म हो जाएगी.

भारतीय सेना ने दुश्मनों को खदेड़ा
कश्मीर घाटी को पाकिस्तानी आतंकियों से बचाने के लिए महाराजा हरिसिंह ने आखिरकार भारत के साथ मिल जाने का फैसला किया. भारतीय सेना ने दुश्मनों को खदेड़ कर रख दिया. फिर इस जंग के आखिरी दिन एलओसी का जन्म हुआ. महाराजा हरिसिंह के हिंदुस्तान के साथ जाने के फैसले के फौरन बाद भारतीय सेना ने कश्मीर में मोर्चा खोल दिया. रात के अंधेरे में विमान के जरिए भारत ने सेना और हथियारों को बिना एटीसी के डायरेक्शन के श्रीनगर में उतार दिया. उस वक्त हमलावर कबायली श्रीनगर से महज एक मील की दूरी पर थे. भारतीय सेना ने सबसे पहले श्रीनगर के इर्द-गिर्द एक सुरक्षा घेरा बनाया. इसके बाद तो जंग की सूरत बदलते देर नहीं लगी.

भारतीय फौज ने लहराया जीत का परचम
जंगी सामान की कमजोर सप्लाई और नक्शों की कमी के बावजूद जांबाज भारतीय सैनिकों ने एक के बाद एक तमाम ठिकानों से पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ना शुरू कर दिया. भारतीय सेना के बढ़ते कदमों की धमक ने तब तक कबायलियों के दिलों में दहशत पैदा कर दी थी. उनमें भगदड़ मच चुकी थी. लिहाजा देखते ही देखते सेना ने बारामूला, उरी और उसके आसपास के इलाकों को वापस कबायलियों से अपने कब्जे में ले लिया. मोर्चा संभालते ही भारतीय सेना ने पाकिस्तान को अहसास करा दिया कि भारत सिर्फ आकार में ही नहीं बल्कि दिलेरी में भी पाकिस्तानी से बहुत बड़ा है. मोर्चा संभालने के अगले कुछ महीनों में ही दो तिहाई कश्मीर पर भारतीय सेना का कब्जा हो चुका था. भारतीय फौज जीत का परचम लहरा चुकी थी !

ऐसे अलग हुआ एलओसी और पीओके
इस जंग के बाद कश्मीर का मसला संयुक्त राष्ट्र में पहुंचा. जिसके बाद 5 जनवरी 1949 को सीजफायर का ऐलान कर दिया गया. तय हुआ कि सीजफायर के वक्त जो सेनाएं जिस हिस्से में थीं उसे ही युद्ध विराम रेखा माना जाए. जिसे एलओसी कहते हैं. इस तरह कश्मीर का कुछ हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया जिसे आज पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) कहा जाता है. जिसमें गिलगित, मीरपुर, मुजफ्फराबाद, बाल्टिस्तान शामिल हैं.

1947 से शुरू हुई कश्मीर पर कब्जे की जंग
कश्मीर को जख्मी करने वाली इस वारदात को आज करीब 70 साल हो गए हैं. पाकिस्तान अभी भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है. पूरे कश्मीर पर कब्जे के लिए शुरू हुई 1947 से ये जंग अब भी जारी है. 1949 में सीजफायर के ऐलान के बाद एलओसी की लकीर खिंच चुकी थी. यहां तक कि उसके बाद पाकिस्तान से लगने वाली तमाम सरहदों पर जो सेनाएं तैनात की गईं वो आज तक कायम हैं. 1949 से लेकर 1965 तक कश्मीर को हथियाने के लिए पाकिस्तान कोई न कोई मक्कारी करता रहा.

भारतीय सेना ने पाकिस्तान के मंसूबों पर फेरा पानी
आजादी के बाद एक तरफ हिंदुस्तान तरक्की की नई ऊंचाइयां छू रहा था तो वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान ने अपनी सारी ताकत दुनियाभर से हथियारों को बटोरने में जुटा रखी थी. भारत से करारी शिकस्त के बाद भी पाकिस्तान बाज नहीं आया और उसने कश्मीरी जेहादियों के भेस में अपनी सेना के जवानों को चोरी छिपे करगिल की पहाड़ियों पर घुसा दिया. लेकिन ऑपरेशन विजय चलाकर भारतीय जांबाजों ने दुश्मन के नापाक मंसूबों पर पानी फेर दिया. हालांकि पहाड़ियों की ऊंचाई की वजह से पाकिस्तानी आतंकियों का सामना करने में भारतीय फौज के सामने कई मुश्किलें आ रही थीं. लेकिन भारत ने तोपों की गरज ने दुश्मन के हौसले पस्त कर दिए. भारतीय फौज ने 26 जुलाई 1999 को कारगिल से पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार भगाया.

सरहद की सुरक्षा में बीएसएफ के जवान, बचकर रहना पाकिस्तान-

kashmir-2नफरत की बुनियाद पर खींची गई हिंदुस्तान और पाकिस्तान की सरहद की लकीर के दोनों तरफ माहौल गर्म है. वैसे तो हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच पांच तरह की सरहदी लकीरें हैं, मगर सबसे ज्यादा हलचल इस वक्त एलओसी यानी लाइन ऑफ कंट्रोल पर है. वही एलओसी जिसे पार कर भारत ने पाकिस्तान को पाकिस्तान में घुस कर मारा और उसी के बाद से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है और लगातार एलओसी पर गड़बड़ी करने की फिराक में है. सरहद पर डटे हमारे जवान इतने मुस्तैद हैं कि PAK की एक नहीं चल रही.

पाकिस्तान के उरी हमले का बदला हिंदुस्तान ने एलओसी के तीन किलोमीटर अंदर घुस कर सर्जिकल स्ट्राइक से लिया. इस हमले के बाद से ही पाकिस्तान बौखलाया हुआ है. वो पचा नहीं पा रहा है कि हिंदुस्तान इस तरह घर में घुस कर भी उसे मार सकता है. लिहाजा अब वो इस फिराक में लगा हुआ है कि कैसे भी और किसी भी तरह अपनी शर्मिंदगी मिटा सके. इसके लिए वो लगातार छटपटा रहा है और उसी छटपटाहट में एलओसी पर लगातार गोलीबारी भी कर रहा है.

मगर पाकिस्तान ये नहीं जानता कि बॉर्डर के शेर जागे हुए हैं. हर उस लकीर पर, जो पाकिस्तान की लकीर खींचती है, हमारे जवानों की पैनी नजरें गड़ी हैं. एलओएसी से लेकर एलएओसी, भारत-पाकिस्तान इंटरनेशनल बॉर्डर से लेकर वर्किंग बॉर्डर हर जगह, चप्पे-चप्पे पर निगरानी रखी जा रही है. दरअसल भारत और पाकिस्तान की सरहदें कुल पांच हिस्सों में बंटी हुईं हैं यानी कुल पांच तरह की सरहदें हैं:

1. एलओएसी- लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल
ये सियाचिन की सीमा तय करती है.

2. एलओसी- लाइन ऑफ कंट्रोल
ये सिर्फ कश्मीर से लगता है. इसे विवादित सीमा माना जाता है.

3. वर्किंग बॉर्डर
ये पाकिस्तान में सियालकोट वगैरह और भारत में कश्मीर की लाइन खींचता है.

4. भारत-पाकिस्तान बॉर्डर
इसे लेकर कोई सीमा विवाद नहीं है.

5. समुद्री सीमा
दोनों देशों की समुद्री सीमा और लाइन ऑफ कच्छ की लकीर खींचती है.

लाइन ऑफ कंट्रोल को छोड़ कर दोनों देशों के बीच बाकी किसी सीमा को लेकर ऐसा बड़ा विवाद नहीं है. अब चूंकि एलओसी को दोनों ही देश विवादित मानते हैं, लिहाजा एलओसी पर ही सबसे ज्यादा हलचल रहती है. कहते हैं कि दुनिया में साउथ कोरिया और एलओसी से ज्यादा किसी और बॉर्डर पर इतनी गश्त नहीं होती.

उरी हमले के जवाब में एलओसी पर सर्जिकल स्ट्राइक भारत की एक सोची -समझी रणनीति का भी हिस्सा था. चूंकि एलओसी को वैसे ही दोनों देश विवादित मानते हैं. ऐसे में एलओसी के अंदर ऐसा कोई ऑपरेशन करना किसी देश की सीमा में घुसपैठ या उस देश पर हमला नहीं माना जा सकता, ना ही इसे जंग कहा जा सकता है.

PAK फौज को सर्जिकल स्ट्राइक की जानकारी
अलबत्ता अगर भारत यही सर्जिकल स्ट्राइक भारत-पाक बॉर्डर के किसी हिस्से में घुस कर करता, तब उसे सीमा का उल्लंघन या जंग की धमकी माना जाता और ये बात खुद पाकिस्तान के विशेषज्ञ भी कह रहे हैं. सर्जिकल स्ट्राइक के बाद बाकायदा भारतीय फौज ने पाकिस्तानी फौज को इस ऑपरेशन की जानकारी भी दी थी. वजह यही थी कि जहां पर ये ऑपरेशन हुआ, वो एलओसी था यानी विवादित जगह.

सरहद पर चौबीसों घंटे मुस्तैद हैं जवान
भारत-पाकिस्तान सीमा के दोनों तरफ हलचल है. चाहे तैनाती की बात हो, गश्त की या फिर चौकसी की. बीएसएफ सरहद पर एक साथ कोई मोर्चों पर लड़ रही है. पाक फौज और रेंजर्स पर नजर रखने के साथ-साथ उसे पाकिस्तान के बेलगाम आतंकवादी संगठनों से जुड़े आतंकवादियों से भी निपटना होता है. पर इन तमाम दुश्वारियों के बावजूद पाक के नापाक करतूतों का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए हिंदुस्तान के जांबाज सरहद पर चौबीसों घंटे मुस्तैद हैं.

परिंदा भी नहीं मार सकता पर
उरी से लेकर बारामूला और हीरानगर से लेकर अखनूर तक भारत और पाकिस्तान के बॉर्डर पर बीएसएफ की ऐसी निगरानी है कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता. दिन के वक्त सूरज की रोशनी में बॉर्डर की निगरानी करना एक बात है और रात के घुप्प अंधेरे में कायर आतंकवादियों पर निगाह बनाए रखना अलग बात है.

कंटीले तारों पर 440 वोल्ट का करंट
हीरानगर के पूरे इलाके में बॉर्डर पर कंटीले तारों का बाड़ लगा है, जिस पर 440 वोल्ट का करंट दौड़ता है. इस तार को छूने भर से ही मौत यकीनी है, लेकिन सिर्फ तार लगाने भर से बीएसएफ या फौज चैन की सांस नहीं ले सकती. ऐसे में इन तारों के साथ-साथ सरहद पार से होनेवाली किसी भी गोलीबारी या हमले का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए हिंदुस्तान के जांबाज दिन रात तैयार रहते हैं और इस काम के लिए रात के अंधेरे में बुलेटप्रूफ बख्तरबंद गाड़ियां जवानों की मददगार बनती हैं.

हरकत देखते ही शूट एट साइट की छूट
बीएसएफ ने इलाके में बॉर्डर पर तेज रोशनी का भी इंतजाम किया है, साथ ही जवानों के पास नाइट विजन कैमरे भी मौजूद हैं. ताकि अगर कोई भी घुसपैठिया इस इलाके में सुरक्षा इंतजामों को भेदने की कोशिश करे, तो उसे तुरंत देख लिया जाए और देखते ही गोली मार दी जाए और ये बीएसएफ को दी गई खास छूट की बदौलत मुमकिन हुआ है, जिसमें किसी भी घुसपैठ की कोशिश या संदिग्ध हरकत देखते ही जवानों को शूट एट साइट यानी देखते ही गोली मारने की छूट दी गई है.

हम चैन से सोते हैं क्योंकि ये निगरानी करते हैं
वैसे तो बॉर्डर पर एक नहीं सौ खतरे हैं, जिनमें सरहद पार से होनेवाली फायरिंग से लेकर जंगली जानवर और जहरीले सांपों तक का खतरा शामिल है. लेकिन हिंदुस्तान के जांबाज हैं कि जान हथेली पर लेकर हर वक्त इन बॉर्डर की निगरानी करते हैं. अब गुजरते वक्त के साथ बीएसएफ ने तकनीकी तौर पर भी खुद को काफी अपग्रेड कर लिया है. इस वक्त बीएसएफ के पास ढाई सौ गज की रेंज तक वाले नाइट विजन कैमरे हैं, तो टेलीस्कोप रायफल भी है.

जैसलमेर का भारत-पाक बॉर्डर
जैसलमेर का भारत-पाक बॉर्डर शुरू से ही बेहद अहम रहा है, लेकिन दोनों मुल्कों के बीच मौजूदा हालात ने यहां तनाव कुछ ज्यादा ही बढ़ा दिया है. असल में सरहद के उस पार बहावलपुर और रहीम यार खान जैसे इलाके हैं, जहां हाफिज सईद और अजहर मसूद जैसे आतंकी सरगनाओं की हलचल रहती है. ऐसे में यहां बीएसएफ का और भी चौकन्ना होना लाजिमी है. भारत-पाकिस्तान की सीमा से लगे इस रेगिस्तानी इलाके में मुश्किल हालात के बीच चौबीसों घंटे सरहद की चौकसी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है.

वैसे तो ये बॉर्डर आतंकवादियों और तस्करों की घुसपैठ के लिहाज से पहले से ही संवेदनशील है, लेकिन अब नए हालात में इसकी संवेदनशीलता कहीं ज्यादा बढ़ गई है. एक तरफ हिंदुस्तान के सर्जिकल स्ट्राइक का दर्द पाकिस्तान को साल रहा है, वहीं दूसरी तरफ बॉर्डर के उस पार बहावलपुर और रहीम यार खान जैसे इलाके हैं, जहां आतंकवादी गतिविधियां भी चलती रहती हैं. वैसे ये बॉर्डर कुछ और मायनों में भी खास है, बीएसएफ की ओर से इस बॉर्डर की निगरानी में वीरांगनाएं भी शामिल रहती हैं.

ऊंट हैं जवानों के सबसे भरोसेमंद साथी
बीएसएफ की एक कमांड में करीब 20 पोस्ट होती हैं, जिसकी सीमा करीब 60-65 किलोमीटर होती है. ऐसे में ऊंट इन जवानों का सबसे भरोसेमंद साथी रहता है. पैदल गश्त के साथ ही बॉर्डर पर फेंसिंग के बीच जगह-जगह खाली बोतलें लटकाई गई हैं. इसका मकसद भी बेहद खास है.

सरहद पर रहने वालों की भी हिफाजत करते हैं हमारे जवान
सरकार ने बेशक सरहदी गांवों को खाली कराने का हुक्म जारी कर दिया हो, लेकिन जांबाज हिंदुस्तानी जवानों की तरह सरहद पर बसे लोग भी पाकिस्तान से मुकाबला करने को तैयार रहते हैं. इन गांव वालों को अपनी फौज और बीएसएफ पर पूरा यकीन है. ये और बात है कि कई गांव सरकार के आदेश के बाद काफी हद तक खाली हो चुके हैं, लेकिन पाकिस्तान को सबक सिखाने की ख्वाहिश लोगों के दिलों में है !




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