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Saturday 20 October 2018
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एक कवि जिसकी मौत पर श्मशान में चला ठहाकों का दौर- काका हाथरसी के जन्मदिवस पर विशेष

एक कवि जिसकी मौत पर श्मशान में चला ठहाकों का दौर- काका हाथरसी के जन्मदिवस पर विशेष

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काका हाथरसी के जन्मदिवस पर विशेष

काका हाथरसी यानि हंसी। हास्य और काका एक दूसरे के पर्याय है। वह चाहते ही नहीं थे कि कोई रोए। इस दुनिया में सब हंसे। यही कारण था कि  वह अपनी वसीयत में भी यही लिख गए कि कोई उनकी मौत पर रोये नहीं। सब हंसे। एक संयोग ही था कि जिन दिन काका पैदा हुए, उन्होंने प्राण भी उसी दिन त्यागे। 18 सितंबर 1906 को काका का जन्म हुआ और इसी दिन 21 साल पहले वर्ष 1995 को उनका देहांत हुआ।उनकी वसीयत के हिसाब से जब  श्मशान में काका की चिता जल रही थी तो उस दिन वहां विशाल हास्य कवि सम्मेलन हो रहा था। कोई शख्स रोया नहीं, बल्कि सबने ठहाके लगाए।  काका की वसीयत के मुताबिक उनके शव को ऊंटगाड़ी पर रखकर आधी रात को श्मशान में ले जाया गया और फिर वहां हास्य कवि सम्मेलन हुआ। काका हाथरसी ने हास्य को हिंदी साहित्य से जोड़ा। काका का असली नाम बहुत कम लोग जानते होंगे।  प्रभूलाल गर्ग यानि काका हाथरसी का जन्म 1906 में शहर में जैन गली में हुआ। उनका बचपन काफी गरीबी में बीता। पिता की जल्दी मौत होने के बाद वह अपनी ननिहाल इगलास चले  गए और वहां पढ़ने लगे। गरीबी में काका ने चाट-पकौड़ी तक बेची। कवि सम्मेलनों के मंचों पर भी काका छाने लगे। आखिर प्रभूलाल गर्ग काका कैसे बने, यह भी एक दिलचस्प किस्सा है। बचपन में काका ने एक नाटक में काका का अभिनय किया। बस तभी से लोग उन्हें प्रभूलाल गर्ग की जगह काका हाथरसी के नाम से बुलाने लगे। फिर तो प्रभूलाल गर्ग काका ही हो गए। किशोर अवस्था में काका फिर अपने परिवार के साथ हाथरस आ गए।

काका का फिल्मों से कनेक्शन- हाथरस में काका की नौकरी लगी लेकिन कुछ दिन बाद वह भी छूट गई। काका चित्रकला में भी काफी दक्ष थे। उन्हंने चित्रशाला भीkaka चलाई लेकिन वह भी नहीं चली। उन्होंने संगीत का भी काफी ज्ञान था। इसके बाद उन्होंने संगीत नामक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। इसका प्रकाशन अभी भी हो रहा है।   

इधर, काका ने लिखना नहीं छोड़ा। उनकी पहली कविता इलाहबाद से प्रकाशित होने वाली पत्रिका गुलदस्ता में छपी। यहीं से उन्हें प्रसिद्धी मिली और लाल किले पर 1957 में कवि सम्मेलन में काका को जब बुलावा आया तो काका ने अपनी शैली में काव्यपाठ किया।

कवि सम्मेलनों में काका का जादू चल निकला। सन 1966 में ब्रजकला केंद्र के कार्यक्रम में काका को सम्मानित किया गया। 1985 में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने काका को पद्मश्री से सम्मानित किया। 1989 में काका को अमेरिका के वाल्टीमौर में आनरेरी सिटीजन का सम्मान मिला। वह वहां भी काव्यपाठ करने गए। यही नहीं काका ने फिल्म जमुना किनारे में अभिनय भी किया। काका हास्य को टॉनिक बताते थे।




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